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		<title>IslamQuest | islamquest.net</title>
		<description><![CDATA[Religion Questions]]></description>
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			<title>Religion Questions</title>
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			<title>अल्लाह ने इतने ज़्यादा नबियों को क्यों भेजा है?</title>
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			<description><![CDATA[अल्लाह का अपने बन्दों पर एक एहसान यह रहा है कि किसी भी ज़माने को रहनुमा और नबी के बग़ैर नहीं छोड़ा और पैग़म्बरों के भेजे जाने का सिलसिला किसी ज़माने में नहीं रुका और ज़मीन अल्लाह के नुमाइंदे और उसके दूत से कभी ख़ाली नहीं रही. धर्मों की बहुलता और अगले धर्मों की पूर्णता वक्त और ज़माना गुजरने के साथ इंसानों की बौद्धिक शक्ति के विकास के अनुसार होती है. या यूँ कहा जाए कि पहले ज़माने के मनुष्य में अस्तित्व के ऐतेबार से इतनी क्षमता नहीं थी कि वह एक व सम्पूर्ण दीन के सारे अनुदेशों को एक साथ ग्रहण करसके. इस लिये पूरा दीन इस्लाम  उन के लिए नहीं भेजा गया. अतः आवश्यकता थी कि धीरे धीरे दीन अनुदेशों और नबियों को उसके लिए भेजा जाए ताकि उसकी बौद्धिक शक्ति का विकास हो और उस में सम्पूर्ण दीन को ग्रहण करने की क्षमता पैदा हो सके. मानवता और इंसानियत में पैग़म्बर ए अकरम स के ज़माने तक पहुंचने तक इस हद तक क्षमता पैदा होगई थी कि अल्लाह ने उसके लिए अपना सम्पूर्ण और व्यापक दीन इस्लाम भेज दिया और उसकी सुरक्षा व हिफाज़त स्पष्टीकरण और व्याख्या की ज़िम्मेदरी मासूम इमामों को सौंपी. फिर भी इस दीन की हिफाज़त के साधन मौजूद हैं और ये काम लोगों के दरमियान में से वह लोग करते हैं जो दीन की हक़ीक़त तक पहुँच जाते हैं और उसे दूसरों को भी पहचनवाते हैं .   इस बात से पहले तो यह पता चलता है कि नए नबी को भेजने का उद्देश पिछले दीनो में पैदा होने वाली विकृतियों और खराबियों को दूर करना है. दूसरी बात यह कि दीन को विकृतियों और खराबियों से बचाने का काम इन्सान की प्रतिभा को परखे बग़ैर नहीं हो सकता है. अल्ल्लाह का अपने बन्दों पर एक एहसान यह रहा है कि उस ने किसी भी कौम किसी भी ज़माने में रहनुमा और मार्गदर्शक के बग़ैर नहीं छोड़ा है. क्यों कि इन्सान एक ऐसा मुसाफिर है जो बहुत से स्थानों को पीछे छोड़ आया है और बहुत सी मंजिलें उसके सामनेआने वाली हैं. और इलाही ईश्वरीय रहनुमाई और दिव्य मार्गदर्शन के बग़ैर उसे पता ही नहीं चल सकता कि किन जगहों को वो पीछे छोड़ आया है और किस मंजिल की तरफ़ उसे जाना चाहिए. इसी ज़रूरत और सवाल के जवाब में अल्लाह फरमाता है :    و لقد بعثنا فی کل امه رسولا [ 1 ]    हमने हर उम्मत में कोई न कोई रसूल भेजा       	  و ان من امه الا خلا فیها نذیر [ 2 ]  	और कोई उम्मत दुनिया में ऐसी नहीं गुज़री कि उसके पास हमारा डराने वाला पैग़म्बर न आया हो  	 ثم ارسلنا رسلنا تترا [ 3 ]  	फिर हमने लगातार बहुत से पैग़म्बर भेजे    कुरआन की आयातों और मासूमीन अ.स की हदीसों और बौद्धिक तर्कों के अनुसार ज़मीन कभी भी खुदा की हुज्जत से न खाली रही है और न रह सकती है.    لم یکن الذین کفروا من اهل الکتاب و المشرکین منفکین حتى تاتیهم البینه [ 4 ]        अहले किताब और मुशरिकों से जो लोग काफिर थे जब तक कि उनके पास खुली हुई दलीलें न पहुँचे वह अपने कुफ्र से बाज़ आने वाले न थे.    दरअस्ल यह आयत धर्मशास्त्र के एक उसूल काएद ए लुत्फ़  की तरफ़ इशारा कर रही है. और अल्लाह हर कौम में अपनी हुज्जत को तमाम अंतिमेत्थम करने के लिए स्पष्ट तर्क और कारण बताता और भेजता है . [ 5 ] अगरचे सारे दैवीय धर्म अपनी सम्पूर्णता की क्षमता के हिसाब से बराबर नहीं थे लेकिन समय और जगह भिन्न होने के बावजूद सभी दिव्य दूतों और नबियों के निमंत्रण का मुख्य उद्देश एक ही था . उन सब ने इंसानों को खुदा की बंदगी करने और शैतान और बुराइयों से दूर रहने का सन्देश दिया है:   و لقد بعثنا فی کل امه رسولا ان اعبدوا الله و اجتنبوا الطاغوت [ 6 ]    और हमने तो हर उम्मत में एक न एक रसूल इस बात के लिए ज़रुर भेजा कि लोगों ख़ुदा की इबादत करो और बुतों की इबादत से बचे रहो        क्यों की जब तक तौहीद की बुनियाद मज़बूत न हों और बुराइयों को समाज से दूर न किया जाए उस समय तक किसी भी तरह का सुधारवादी कार्यक्रम नही चलाया जासकता है.   सवाल यह है कि अल्लाह ने पहले ही से एक ही नबी द्वारा एक समपूर्ण और मुकम्मल दीन या शरीअत क्यों नही भेजा और उसकी हिफ़ाज़त के लिए एक बाद एक दीन और नबी क्यों भेजता रहा?   इस के जवाब में यह कहना चाहिए कि माँ बाप अपने बच्चे की तरबियत करते समय सारी नैतिक और अखलाकी बातें एक साथ नहीं सिखाते और उनपर अमल करने को नहीं कहते.बल्कि उसको धीरे धीरे सिखाते हैं. और जितना सिखाते हैं उतना ही उसपर अमल करवाना चाहते हैं. और बच्चे के बड़ा और बालिग़ होते होते उसको सारी बातें सिखा देते हैं और चाहते हैं कि उसी के मुताबिक़ उस पर अमल करे. [ 7 ]     यही बात इस जगह भी कही जा सकती है कि इंसानियत के शुरुआती दौर हज़रत आदम अ.स के समय में ही उस के लिए मुकम्मल और सम्पूर्ण दीन व शरीअत का भेजना मुमकिन नहीं था क्यों की इन्सानियत कई दौरों से गुज़री है और हर ज़माने में उसका बौद्धिक विकास होता रहा है और जिस तरह उसकी सोच में विकास होता रहा उसकी बौद्धिक और मनोवैज्ञानिक ज़रूरतें भी बढती गयीं. और दूसरी तरफ़ से उसमें दीन व शरीअत के बड़े और कठिन निर्देशों को लेने और उनका पालन करने की क़ाबलियत भी बढती गई.जबकि शुरू से ही उस में यह काबिलयत और ताक़त न थी. इसके अनुसार ज़रूरी था कि शुरुआत में उसके लिए सरल अनुदेश शिक्षायें और धर्मशास्त्र भेजे जाएँ ताकि वह उन्हें आसानी से समझ सके और उसमें अगली इस्लामी शिक्षायें ग्रहण करने की योग्यता पैदा हों सके.   इसीलिए हज़रत आदम अ.स पहले नबी की हैसियत से इंसानों तक उनकी अंदरूनी क्षमताऔर काबिलियत के अनुसार अनुदेश पहुचाते थे.और बाद में आने वाले नबी और पैग़म्बर अपने समय के इंसानों की काबिलयत और बौध्धिक क्षमता के अनुसार बड़े और अधिक अनुदेश देते थे और इस तरह पहले वाली शरीअत को भी पूर्ण करते जाते थे यहाँ तक कि पैग़म्बर मुहम्मद स.अ का ज़माना आने तक एक मुकम्मल और सम्पूर्ण दीन और शरीअत इसानों के सामने पेश करदी गई. और इसके बाद अब कोई दीन व शरीअत नहीं आएगी.    अगरचे अल्लाह के सारे नबीयों और पैग़म्बरों का उद्देश एक ही था और सब एक ही अल्लाह की तरफ़ निमंत्र्ण देते थे लेकिन उनकी शरीअत की वैधता अगला नबी और नई शरीअत आने से पहले तक थी जिस के आने की सुचना पहली शरीअत में दी जा चुकी होती थी. और नए नबी और नई शरीअत के आ जाने के बाद पहले दीन के मानने वालों की ज़िम्मेदारी हो जाती थी के उस नए दीन और नबी के अधीन होजाएं और उनकी बताई हुई बातों का पालन करें.    इस तरह इस्लाम के आने के बाद पिछले सारे दीनों और शरीअतों की वैधता ख़त्म होजाती है और उनके मानने वालों पर इस्लाम के अनुदेशों और हुक्मों का पालन करना ज़रूरी होजाता है.   इन बातो से मालूम होता है कि पहले तो विभिन्न नबियों और दूतों को भेजने का उद्देश पिछले दीनों में पैदा होने वाली खराबियों को दूर करना है और दुसरे सम्पूर्ण दीन के आने के बाद और उसकी हक़ीक़त को ग्रहण करने वालों की मौजूदगी की वजह से वह बाक़ी व महफूज़ रहता है और उनके द्वारा ही दूसरों तक पहुँचता है.   अधिक जानकारी के लिए देखें:   १. शीर्षक: इस्लाम की वैधता के कारण और दलीलें प्रश्न संख्या २७५ वेब साईट ७३     २. शीर्षक: शिओं की वैधता प्रश्न संख्या १५२२  वेब साईट २०११    ३. हादवी तेहरानी किताब मबानिये कलामीय इज्तेहाद  प ६१ और उसके बाद.   ४. हादवी तेहरानी किताब बावरहा व पुर्सिशहा  सरे खातिमयत  प ३३        	 		   	 	 		 [ 1 ] .नहल;३६.  	 		 [ 2 ] .फ़ातिर ;२४  	 		 [ 3 ] .मोमेनीन ;४४  	 		 [ 4 ] .बय्य्यिना;१.  	 		 [ 5 ] .देखें जवादी आमुली तफसीरे मौज़ुई ए कुर आन ज६ सीर ए पयामबरान दर कुरआन ; तफसीरे नमूना ज२७ प२०२ .  	 		 [ 6 ] .नहल;३६  	 		 [ 7 ] . तफसीरे नमूना ज११  प २२१]]></description>

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			<title>शिया मज़हब सबसे अच्छा क्यों है?</title>
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			<description><![CDATA[शिया मज़हब की बरतरी और श्रेष्ठता उसके हक़ और सच्चे होने की वजह से है. और सच्चा और सही दीन हर ज़माने में एक ही रहा है और दुसरे धर्म या तो सिरे से ही बातिल झूठे और बेबुनियाद हैं या अमान्य और मनसूख़ हो चुके हैं और मौजूदा समय में सच्ची और सही शरीअत और धर्म सिर्फ इस्लाम है. और इस्लाम की सही सूरत सिर्फ शिअत में दिखाई देती है और शिया मजहब की शिक्षाएं ही असली मुहम्मदी इस्लाम बता सकती हैं. 	इतिहास और धार्मिक ग्रंथों से ये बात प्रमाणित और साबित है. और वहाबियत में यह बात और खासियत नहीं पायी जाती है. दुसरे मज़हबों की तुलना में शिया मज़हब की बरतरी और श्रेष्ठता उसके हक़ और सच्चे होने की वजेह से है. और सच्चा और सही दीन हर ज़माने में एक ही रहा है और हर ज़माने में अल्लाह ने एक शरीअत भेजी है और उसके अलावा जितने दीन या धर्म हैं वो सिरे से झूठे हैं या अमान्य और मनसूख हो चुके हैं. 	अब तक जितने दीन और मज़हब इंसानों के लिए आए हैं उनकी बहुलता लम्बाई एक के बाद एक में है न की एक दुसरे से अलग होकर इस तरह कि बाद में आने वाली नई शरीअत और दीन पहले वाले दीन को मुकम्मल और पूर्ण करने के लिए आता और उसके आने के बाद पहले वाला दीन अमान्य हो जाता है और उसकी जगह वही नया दीन ले लेता है. और सब पर उस नए दीन पर इमान लाना और उसकी की पैरवी करना अनिवार्य हो जाता है. इसीलिए धार्मिक ग्रंथों और किताबों में उन लोगों को काफ़िर कहा जाता है जो नए दीन पर ईमान नहीं लाते हैं. 	इस्लाम इंसानियत और मानवता के लिए भेजा गया आखिरी दीन है और अल्लाह इस्लाम के अलावा किसी और दीन को कुबूल नहीं करेगा. ان الدین عندالله الاسلام [ 1 ]  बेशक अल्लाह के नज़दीक मान्य दीन सिर्फ इस्लाम है.  	 و من یبتغ غیر الاسلام دینا فلن یقبل منه [ 2 ]  अगर कोई इस्लाम के अलावा कोई दूसरा दीन चुनेगा तो उसको क़ुबूल नहीं किया जायेगा.  	अफ़सोस कि मुसलमान भी पिछली क़ौमों और दीनों के मानने वालों की तरह विभिन्न समुदायों में बट गए हैं तो ज़ाहिर उन में से सब एक ही समय में सच्चाई और हक़ पर नही होंगे. 	हजरत मोहम्मद स ने फरमाया था: 	 ان امتی ستفرق بعدی علی ثلاث و سبعین فرقه ، فرقه منها ناجیه ، و اثنتان و سبعون فی النار  	मेरे बाद मेरे मानने वाले ७३ समुदायों फ़िर्क़ों में बट जाएँगे उन में से सिर्फ एक समुदाय को नजात मिलेगी और दुसरे ७२ समुदाय जहन्नम नरक में जायेंगे. [ 3 ]  	सारे इस्लामी फ़िर्क़ों में सही और नजात पाने वाला फ़िर्का और समुदाय शिया ही है. और यह शिया मज़हब ही सही और सच्च्चा इस्लाम है. 	पैग़म्बर स फ़रमाया हैं: 	 ایها الناس انی ترکت فیکم ما ان اخذتم به لن تضلوا ، کتاب الله و عترتی اهل بیتی  	  	ऐ लोगो; मैंने तुम्हारे बीच ऐसी चीज़ छोड़ी है कि अगर तुम उसे लोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे अल्लाह की किताब और मेरी इतरत यानि अहलेबैअत अ . [ 4 ]  	रसूले ख़ुदा स के भरोसेमन्द और करीबी सहाबी अबुज़र ग़फ़फ़ारि र नक़ल करते हैं: 	 سمعت النبی ص انه قال: الا ان مثل اهل بیتی فیکم مثل سفینه نوح فی قومه ، من رکبها نجی و من تخلف عنها غرق  	 मैंने नबी स को कहते हुए सुना है कि जान लो कि मेरे अहलेबैत की मिसाल तुम्हारे बीच ऐसी ही है जैसे नूह अ की कौम के बीच उनकी कश्ती थी कि जो उस पर सवार हो गया वह नजात पा गया और जिसने उसका विरोध किया वो डूब गया. [ 5 ]  	शिया मज़हब की बुनियाद तौहीद अद्ल नुबुव्वत इमामत और क़यामत पर है. और शिओं का अक़ीदा है कि यह बारह मासूम इमाम अ  पैग़म्बर स के जानशीन और उत्तराधिकारी हैं जिन में सब से पहले अली अ और सब से अंतिम में मेहदी अज हैं. 	रसूले ख़ुदा स की रवायतों में इमामों की संख्या बल्कि उनके नाम तक बताये गए हैं. एक दिन अब्दुल्लाह बिन मसूद रसूल स के सहाबी कुछ लोगों के बीच बैठे हुए थे की बियाबान की तरफ से एक अरब आया और उसने पुछा तुम में से अब्दुल्लाह बिन मसूद कौन है? अब्दुल्लाह ने जवाब दिया: मैं हूँ. अरब ने पुछा : 	هل حدثکم نبیکم کم یکون بعده من الخلفا ؟ قال: نعم ، اثناعشر ، عدد نقبا بنی اسرائیل. 	क्या तुम्हारे नबी स ने बताया है कि उनके बाद उन के कितने जानशीन और उत्तराधिकारी होंगे? अब्दुल्लाह ने कहा: हाँ बारह यानि बनी इस्राईल के नकीबों प्रमुख सरदार की संख्या के बराबर. [ 6 ]  	शिअत की सच्चाई और सत्यता पर हमारी दलील और प्रमाण कुरआन और सुन्नत पैग़म्बर स  की बताई हुई बातें है. अल्लाह ने क़ुरआन में अल्लाह रसूल और उलिलअम्र की आज्ञाओं का पालन और उनकी पैरवी का आदेश दिया है. और पैग़म्बर स के आदेशानुसार यही बारह इमाम ही उलिलअम्र हैं. क़ुरआन की बहुत सी आयतों में इमामत और विलायत की तरफ़ इशारा किया गया है जैसे : 	 و انذر عشیرتک الاقربین ؛  انما ولیکم الله و رسوله و المؤمنون الذین یقیمون الصلاه و یؤتون الذکوه و هم راکعون ،  یا ایها الرسول بلغ ما انزل الیک من ربک و ان لم تفعل فما بلغت رسالته ،  الیوم اکملت لکم دینکم و اتممت علیکم نعمتی و رضیت لکم الاسلام دینا ،  انما یرید الله لیذهب عنکم الرجس اهل البیت ... 	जैसी आयतें. 	और इतिहास व रवायतों की गवाही के मुताबिक रसूल ख़ुदा नियमित तौर पर हज़रत अली अ को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर बताते रहते थे. जैसा ख़ुद तबरी अपनी इतिहास की किताब में नक़ल करते हैं कि जब आयत: و انذر عشیرتک الاقربین  नाज़िल हुई तो पैग़म्बर स ने अपनी कौम से फ़रमाया: अल्लाह ने मुझे हुक्म दिया है की तुम सब को उसकी तरफ बुलाऊँ तो तुम में से जो कोई भी इस काम में मेरा साथ देगा और सहायता करेगा तो वो मेरा भाई उत्तराधिकारी व जानशीन होगा. अली अ ने फ़रमाया: ऐ रसूलल्लाह स मैं इस राह में आप की सहायता करूँगा. पैग़म्बर स ने अली अ की गर्दन में अपने हाथ डाले और कहा: अब से यह तुम्हारे बीच मेरा भाई उत्तराधिकारी और जानशीन होगा. इस की बात सुनना और उस की पैरवी करना. पैग़म्बर स के रिश्तेदार हँसते हुए उठ खड़े हुए और मज़ाक़ उड़ाते हुए जनाबे अबूतालिब अ से कहा: उसने तुमको हुक्म दिया है कि अपने बेटे की पैरवी करो और उसके आज्ञाकारी बन जाओ. [ 7 ]    पैग़म्बर स ने अपने उम्र के आख्रिरी साल में हज से वापसी पर कि जो हज्जतुल विदा आख़िरी हज के नाम से मशहूर है ग़दीरे ख़ुम नाम की जगह पर हज़रत अली बिन अबितलिब अ को आधिकारिक तौर पर मुसलमानो का इमाम और हाकिम बनाया और वहां मौजूद लोगो को हुक्म दिया की अमीरुल मोमिनीन के तौर पर अली अ की बैअत निष्ठा करें. उस दिन का उनका यह हुक्म मशहूर है जिसमें उन्हों ने फर्मिया था:    من کنت مولاه فهذا علی مولاه    जिसका मैं मौला और हाकिम हूँ अली भी उसके मौला और हाकिम हैं. यह हदीस इस्लाम की मशहूर और मुतावातिर हदीसों में से है. यह शिअत की सत्यता सच्चाई और दुसरे मजहबों पर बरतरी व श्रेष्ठा पर वो दलीलें थीं जो दीन में आयतों और रवायतों में बायान हुई हैं. अगरचे दीन के बाहर से शिअत और दूसरे समुदायों की शिक्षाओं की तुलना के ज़रिये भी इस को साबित किया जा सकता है. लेकिन यह बहस किसी और समय करेंगे.   अब वहाबियत के बारे में सय्यद मुस्तफ़ा रिज़वी की किताब इत्त्लेआते सियासी व मज़हबीये पाकिस्तान की ही बात करेंगे जिसमें लिखा है की वहाबी अपने अलावा इस्लाम के सारे समुदायों को काफ़िर बुत परस्त और मुशरिक मानते हैं वह लोग पैग़म्बर स और आइम्मा अ की क़ब्रों की ज़ियारत उनके एहतेराम और उनसे हाजत मांगने को बिदअत और बुत परस्ती कहते हैं और उसे हराम मानते हैं. वह नमाज़ के अलावा हर जगह रसूल स पर सलाम और उनके एहतेराम को हराम मानते हैं आइम्मा अ और महान लोगों की क़ब्रों पर हर तरह की गुंबद या इमारत बनाने को बिदअत कहते हैं. और उनका मानना है कि रसूल स एक कमज़ोर इन्सान थे और अब मर चुके हैं वह अब हमारे और इस दुनिया के बारे में वह कुछ नहीं जानते हैं इसलिए उनकी क़ब्र की ज़ियारत हराम है. [ 8 ]    अब फ़ैसला आपकी अक्ल के हवाले करते हैं कि इस तरह की बातें फ़ितरत और क़ुरआन के मुताबिक़ होसकती हैं. क्या यही है अहलेबैत अ से मोहब्बत जिसे अजरे रिसालत कहा गया है. [ 9 ] क्या क़ुरआन में नहीं आया है कि शहीद जिंदा हैं और अल्लाह के पास से रिज़क पारहे हैं. [ 10 ] क्या रसूल का रुतबा शहीदों से कम है?... अगर इस बारे ज़्यादा जानना चाहते हैं तो हम को फिर लिखें.   	 		   	 	 		 [ 1 ] . आलेइम्रान/१९  	 		 [ 2 ] . आलेइम्रान/८५  	 		 [ 3 ] . अल इबानातुल्कुब्रा इबने बत्ता ज१ प३ खिसाल प५८५.  	 		 [ 4 ] . कन्जुल आमाल ज१ प ४४ बाब अल एतेसाम बिकिताबे वास्सुन्नह.  	 		 [ 5 ] .अल मुस्तदरक अलास्सहिहैन ज३ प१५१.  	 		 [ 6 ] . खिसाल प ४६२.  	 		 [ 7 ] . तारीख़े तबरी ज२ प३२० प्रकाशित मिस्र; कामिल इबने असीर ज२ प४१ प्रकाशित बेरूत.  	 		 [ 8 ] . सय्यद मुस्तफ़ा रिज़वी इत्त्लेआते सियासी व मज़हबीये पाकिस्तान प६३-६४  	 		 [ 9 ] . قل لا اسئلکم علیه اجرا الا الموده فی القربى शूरा/२३  	 		 [ 10 ] . आले इमरान/१६९]]></description>

		</item>
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			<title>क्या दुसरे धर्मों द्वारा इन्सान कमाल और उत्तमता तक पहुँच सकता है? और तौहीद तक कैसे पहुंचा जासकता है ?</title>
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			<description><![CDATA[मौजूदा धर्मों में अगरचे थोड़ी बहुत सच्चाई दिखाई देती है लेकिन सच्चाई का सम्पूर्ण रूप यानि तौहीद अपने सही माना में इस्लाम में ही दिखाई देती है. इस बात की सब सी बड़ी दलील व प्रमाण यह है कि इन धर्मों की कोई मोतबर व मान्य सनद नहीं है और इन की धार्मिक किताबों में विकृती और छेड़ छाड़ हुई है और उनकी बातें भी बुद्धि और अक्ल के विपरीत हैं. जबकि क़ुआन विकृती से दूर है और उसके दस्तावेज़ मान्य और इतिहास मोतबर है इस्लाम धर्म की व्यापकता और इसकी शिक्षाएं भी बुद्धि एवं अक्ल के अनुसार हैं. इस जवाब को और ज़्यादा समझने के लिए पहले ये प्रमाण देना ज़रूरी है की दुनिया में मौजूद दुसरे धर्म मौजूदा समय के अनुकूल नहीं हैं और इस्लाम तमाम धर्मों से श्रेष्ठ और सब से उचित है. 	 	१. दुसरे धर्मों को असिद्धि व कमी के प्रमाण इस्लाम के अलावा : 	इन प्रमाणों को बताने से पहले दो चीज़ों को बताना ज़रूरी है. 	 पहली बात: हमारा मतलब यह नहीं है कि दुसरे सारे धर्मों की शिक्षाएं निराधार और ग़लत हैं और उन में कोई सच्चाइ है ही नहीं. बल्कि हमारा मतलब यह है की मौजूदा धर्मों की कुछ बातें स्वीकारयोग्य नहीं हैं और ये धर्म सच्चाई को सही रूप से नहीं बता सकते हैं.   दूसरी बात: यह कि हम इस मुख़्तसर सी आलोचना में दुनिया के दो अहम धर्मों ईसाइयत और यहूदियत की अयोग्यता की तरफ़ इशारा करेंगे और उस तरह उन धर्मों की अहमियत स्वीकार्यता और मकबूलियत भी मालूम होजाएगी जो इनसे कम और नीचे हैं:    १. इन्जील की सनद क्रमिक मुतावातिर और यकीनी नहीं है.   हजरत ईसा अ बनी इसराइल से थे उनकी भाषा इब्री थी और उन्हों ने बैतूल मुक़द्दस से अपनी नबी होने का एलान और दावा किया था.वहां के लोग भी इब्री थे जिन में से कुछ लोग ही उनपर ईमान लाये जिनके बारे में हमें मालूमात नही है. लेकिन बैतूल मुक़द्दस के कुछ लोग जो यूनानी भाषा भी जानते थे एशिया माइनर के शहरों की तरफ़ चले गए और लोगों को ईसा मसीह के धर्म की तरफ बुलाने लगे. और यूनानी भाषा में किताबें लिखीं और उनमें कुछ बातें लिख कर लोगों से कहा कि: ईसा ने ऐसा ही कहा है. वह लोग जिन्हों ने ईसा मसीह और उनकी बातों और कामों को सुना व देखा था और उनकी भाषा जानते थे वह फिलिस्तीन में थे और उन लोगों ने उनकी नबुव्वत को कबूल नहीं किया था. वह लोग यूनानी भाषा में लिखी हुई बातों को मनगढंत मानते हैं. और जिन लोगों ने इन किताबों और बातो को माना वो दूर के लोग थे न उन्हों ने कभी बैतूल मुक़द्दस को देखा था ना ईसा मसीह को और ना ही उनकी भाषा जानते थे. अगर इंजील में लिखी बातें झूटी भी होतीं तो ना लिखने वाला उसको लिखने से रुकता और ना ही सुनने वाला उनको झुटलाता था. मिसाल के तौर पर इन्जील मत्ता में आया है कि जब ईसा मसीह का जन्म हुआ तो कुछ मजूसी पूर्व की तरफ़ से आये और पुछा कि यहूदियों का बादशाह जो अभी पैदा हुआ है वो कहाँ है? हमने पूर्व में उसके सितारे को देखा है. उन्हों ने उन लोगो को बच्चा नहीं दिखाया लेकिन अचानक आसमान में एक सितारा देखा जो चल कर उस घर के उपर आ कर रुका जिस घर में ईसा मसीह थे जिससे उन को पता चल गया कि ईसा मसीह ईसी घर में हैं. इस तरह की गढ़ी हुई बातें इन्जील में लिखी गई हैं और लिखने वालों को इस की रुसवाई की भी परवाह नहीं थी क्यों कि उन्हों ने ये बातें इब्री ज़बान में बैतुल्मुक़द्दस में रहने वालों के लिए नहीं लिखी थीं बल्कि अजनबियों के लिए लिखी थीं. और उन अजनबियों से बहुत से बहुत बढ़ा चढ़ा कर झूट बोला था. क्यूंकि हमें यक़ीन है कि कोई भी नुजुमी यह नहीं मानता कि किसी के जन्म के साथ एक सितारा भी पैदा होता है जो उसी की उपर चलता रहता है इस बात को ना मजूसी मानते हैं और ना ही ग़ैर मजूसी. यह भी बताते चलें के पुराने ज़माने के इसाईओं में हज़रते ईसा मसीह के क़त्ल के बारे में भी इख्तेलाफ़ है. इन्जील के कुछ नुस्खों में लिखा है कि हज़रत मसीह का क़त्ल हुआ ही नहीं था जब कि अगर किसी शहर में किसी का क़त्ल होता है तो यह बात किसी से छिपती नहीं है खास तौर पर जब किसी को सूली दी जाती है. तो चूँकि इन्जील लिखने वालों ने यह इन्जीलें ऐसे लोगो के लिए लिखी थीं जो बैतूलमुक़द्दस के नहीं थे और और यह उन्ही की ज़बान में थी उन्हें यह पता ही नहीं था कि ईसा का कत्ल हुआ है या नहीं. इसलिए लिखने वालों ने पूरे इत्मीनान से जो चाहा वो लिखा. हजरत ईसा मसीह के तीन सौ साल बाद ईसाई धर्म गुरुओं ने एक कमेटी बनाई जिसमें सलाह मशवेरा किया गया कि किसी न किसी तरह इन इख्तिलाफात को खत्म किया जाए. उस में यह तय पाया कि सारी इन्जीलों में से चार इन्जीलों को ले लिया जाए और उन ही को सही माना जाए और बाक़ी जिन कि कोई हद और हुदूद नहीं थी उनको अमान्य और झूठा घोषित कर दिया जाए. इस तरह इन्जील में ईसा मसीह के कत्ल न किये जाने वली बात को ख़ारिज कर दिया गिया और अनौपचारिक घोषित कर दिया गया. [ 1 ]     २. ईसाइयत के नाकाफ़ी होने का प्रमाण और दलील. मौजूदा इन्जील की बातों में एक दुसरे की विपरीत और उल्टा होना और उनमें विकृतिऔर छेड़ छाड़ होना है. इस बारे में ज़्यादा मालूमात के लिए अल्लमा शेरानी [ 2 ]  की किताब  राहे सआदत  फ़ाज़िल हिंदी की कितबा इजहारूल हक़  और शहीद हाश्मी निजाद की कितबा क़ुआन व किताबी हाई आसमानिए दीगर को देखें.   ३. तीसरा प्रमाण और दलील ईसाइयत के कुछ अक़ीदे और बातें अक्ल और मंतिक़ तर्क और बुद्धि  के खिलाफ हैं. जैसे उनका मानना है की ख़ुदा का बेटा इन्सान की सूरत में आया इन्सान के गुनाहों को अपने उपर ले लिया और सूली पर चढ़ कर और तकलीफ सह कर इंसानों के गुनाहों की भरपाई की. इन्जील योहन्ना में यूँ लिखा है : चूँकि ख़ुदा इस जहान और दुनिया से बहुत मुहब्बत करता है इस लिए उस ने अपने इकलौते बेटे को भी कुर्बान कर दिया. बल्कि उसको अमर कर दिया; ताकि जो कोई भी उस पर ईमान लाये वो हलाक न होस के बल्कि वह भी अमर हो जाए. क्यूंकि ख़ुदा ने अपने बेटे को इस दुनिया में फैसले करने के लिए नहीं बल्कि उसके ज़रिये दुनिया को नजात देने के लिए भेजा था. [ 3 ]    यहूदियत के बारे में भी इसी तरह की शंकाएं पाई जाती हैं. क्योंकि पहले यह की खुद तौरात के तीन नुस्ख़े हैं:    १. इब्रानी नुस्खा जो यहोदियों और प्रोटेस्टेंट विद्वानों के समीप मान्य है.   २. सामरी नुस्खा जो सामरियों बनी इस्राईल का दूसरा गिरोह  के समीप मान्य है.   ३.वह नुस्खा जिसको ग़ैर प्रोटेस्टेंट यूनानी विद्वान मोतबर मानते हैं.     सामरियों के नुस्ख़े में सिर्फ मूसा अ की पांच किताबें युषा और  न्यायाधीशों की पुस्तकें शामिल हैं. वह लोग पुराना नियम  Old Testament की की किताबों को मोतबर नहीं मानते हैं. हज़रत आदम अ से लेकर नूह अ के तूफ़ान तक का समय पहले नुस्ख़े में १६५६ साल दूसरे नुस्ख़े में १३०७ साल और तीसरे नुस्ख़े में १३६२ साल लिखा है. जबकि तीनों नुस्ख़े सही नहीं हो सकते उनमें से सिर्फ एक ही सही होगा और इन में से कौन सा सही है यह मालूम नहीं है. [ 4 ]    दुसरे यह कि: तौरात में भी ऐसी बातें मौजूद हैं जिन्हें इन्सान की अक्ल कबूल नहीं करती है.   मिसाल के तौर पर तौरात में ख़ुदा को इनसान की तरह बताया गया जो रास्ता चलता है गाना गाता है और झूठा और धोकेबाज़ है. माज़ अल्लाह क्योंकि उसने आदम व हव्वा से कहा था कि अगर अच्छाई और बुराई के पेड़ से कुछ खाएंगे तो वह मर जाएँ गे जबकि आदम व हव्वा उस पेड़ का फल खाने के बाद ना सिर्फ नहीं मरे बल्कि अच्छाइयों और बुराइयों को भी जान गए. [ 5 ]    ख़ुदा के साथ हजरते याकूब अ के कुश्ती लड़ने की कहानी जो तौरात में आई है. [ 6 ]    २. इसलाम की सच्चाई और उसके सर्वश्रेष्ठ होने के प्रमाण और दलीलें   १. इस्लाम धर्म के चमत्कार मोजिज़ा का अब तक बाक़ी रहना; क्योंकि इस धर्म का मोजिज़ा क़ुआन है जो किताब तर्क और ज्ञान में से है. जबकि उसके विपरीत पिछले नबियों के मोजिज़े महसूस प्रकार के थे. इसलिए यह क़ुआन हर दौर में जिंदा और बाक़ी रहा है और हज़रत मोहम्मद से के समय तक ही महदूद नहीं है. इसीलिए इस्लाम का मोजिज़ा और चमत्कार जिंदा और बाकी रहने वाला है.   इस के अलावा समय समय पर क़ुआन दूसरों को चुनौतो देता रहा है कि उसका जवाब ले आओ: और अगर तुम लोग इस कलाम से जो हमने अपने बन्दे मोहम्मद पर नाज़िल किया है शक में पड़े हो तो अगर तुम सच्चे हो तो तुम भी उसकी तरह का एक सूरा बना लाओ  [ 7 ]    २. क़ुआन में विकृति और छेड़ छाड़ ना होना; यानि उसमें कोई बदलाओ और तब्दीली नहीं हुई है.    क्योंकि अल्लाह के उस वादे के अलावा की हम क़ुरआन की हिफाज़त करेंगे [ 8 ] खुद हज़रत मोहम्मद स ने भी उसकी हिफाज़त का इस तरह इन्तिज़ाम किया था :   पहले यह कि: जो लोग कातिबाने वही वही को लिखने वाले थे उनको हुक्म दिया था कि हर हर आयत और सूरे को लिखें.   दुसरे यह कि: अपने असहाब और दोस्तों को कुराआन याद करने की ताकीद करते थे इस तरह खुद नबी स के समय में एक बड़ी संख्या ऐसे मुसलमानों की थी जिन्हें पूरा क़ुरआन हिफ्ज़ यानी याद था. तीसरे यह कि : क़ुआन पढने के लिए प्रोत्साहित करते थे; यानी क़ुआन को उसके तरीक़े तज्वीद के अनुसार पढने को कहते ना की सिर्फ उसके मतलब को समझ लें. [ 9 ]    इस वजह से क़ुरआन हर तरह की विकृति और छेड़ छाड़ से सुरक्षित है.   ३. इस्लाम की सच्चाई को साबित प्रमाणित करने का तीसरा रास्ता पैग़म्बर स का आखरी नबी होना खातिमियत है क्योंकि इसलाम की धार्मिक किताब [ 10 ] में ताकीद की गई है की हज़रत मुहम्मद स आखरी पैग़म्बर हैं और उनके बाद कोई नबी नहीं आएगा.   और हर इंसानी समाज में यही आखरी क़ानून शरीअत लागू होगा और इसी पर अमल करना अनिवार्य होगा. और नए क़ानून के आजाने के बाद पुराने क़ानून अपने आप रद्द और अमान्य हो जाते हैं.    दुसरे धर्मों की किताबों में यह नहीं आया है कि उनका नबी अल्लाह का आखरी नबी था बल्कि उन नबियों ने अपने मानने वालों को किसी न किसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम के आने की खुशखबरी ज़रूर दी है; [ 11 ] यानि अपने अअस्थायी होने का एलान किया है.   ४. चौथी बात जिस पर ध्यान देना ज़रूरी है वह इस्लाम की व्यापकता है कि इस्लाम में रूहानी ज़ेहनी व्यक्तिगत और सामाजिक भौतिक और और आध्यात्मिक जैसे ज़िन्दगी के हर मसले के लिए शिक्षाएं मौजूद हैं. इस्लाम की व्यापकता और उसकी श्रेष्ठता को बेहतर तौर पर समझने के लिए दुसरे धर्मों के ग्रन्थों और इस्लामी ग्रन्थ का होना का तुलनात्मक अध्ययन होना    चाहिए . इस सूरत में आस्था एतेक़ादी  तौहीद और अल्लाह के सिफात व्यक्तिगत और सामाजिक नैतिकता कानून अर्थव्यवस्था सियासत व हुकूमत व ... जैसे सारे मसलों में इस्लामी शिक्षाओं की व्यापकता और श्रेष्ठता मालूम होजाती है.   ५. पांचवें यह कि; इस समय मौजूदा धर्मों में से सब से सही और जिंदा इतिहास इस्लाम का है कि इसके इतिहासकारों ने पैग़म्बर स के बचपन तक की छोटी से छोटी बातों को लिखा है जबकि दुसरे धर्मों का कोई प्रामाणिक और मोतबर इतिहास मौजूद नहीं है.यही वजह है कि कुछ पच्छिमी विचारक ईसा मसीह अ के होने के बारे में भी शक करते हैं और अगर हम मुसलमानों के क़ुरआन ने हज़रत मसीह अ और दुसरे नबियों के बारे में न बताया होता तो शायद ईसाई और यहूदी धर्म इस तरह इंसानी समाज में मौजूद ना होते. [ 12 ]     	 		   	 	 		 [ 1 ] . शेरानी अबुलहसन राहे सआदत प १८७ १८८ १९७ २२१  	 		 [ 2 ] . पिछला  	 		 [ 3 ] . इन्जील योहन्ना ३ १६-१७  	 		 [ 4 ] . राहे सआदत प २०६ व २०७  	 		 [ 5 ] .तौरात सफर ए पैदाइश बाब २ व ३  	 		 [ 6 ] . पिछला बाब २१ आयत २४  	 		 [ 7 ] . बकरा/२३  	 		 [ 8 ] . हीज्र/९  	 		 [ 9 ] . राहे सआदत प २२ २१५ २४ २५   	 		 [ 10 ] .अहज़ाब/४० - सही बुख़ारी ज ४ प२५०  	 		 [ 11 ] . राहे सआदत प २२६-२४१; इन्जील योहन्ना २१ ४१  	 		 [ 12 ] . मजमुए आसार ज १६ प ४४ .]]></description>

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			<title>ईमान क्या है?</title>
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			<description><![CDATA[आध्यात्मिक विषयों से गहरे लगाओ को ईमान कहते हैं जो इन्सान के समीप बहुत पवित्र और मुक़द्दस होते हैं और इन्सान उनके लिए अपनी मोहब्बत और बहादुरी दिखाने को तय्यार रहता है. 	क़ुरआन में ईमान के दो पंख बताये गये हैं:इल्म ज्ञान और अमल कर्म . क्योंकि इल्म अमल के बग़ैर कुफ़्र के साथ भी जासकता है और अमल इल्म के बग़ैर निफ़ाक़ पाखंड के साथ भी रह सकता है. 	इस्लामी धर्मशास्त्रियों के बीच इमान के बारे में तीन तरह के नज़रिये हैं: 	१. अशाएरह: इमान यानी अल्लाह के होने उसके नबियों और उसकी आज्ञाओं को मानना. 	२. मोतज़ेला: ईमान यानि उन बातों और ज़िम्मेदारियों पर अमल करना जो अल्लाह की तरफ़ से कही गई हैं. 	३. दार्शनिक धर्मशास्त्र : ईमान यानि दुनिया मौजूद हक़ीक़तों के बारे में जानकारी पैदा करना और उसके ज़रिये अपने नफ़स ख़ुद को कमाल उत्तमता तक पहुँचाना. 	  लेकिन रहस्यवादीयों का नज़रिया यह है कि ईमान यानि सिर्फ़ अल्लाह को निगाह में रखना और उसके अलावह हर चीज़ से मुंह मोड़ लेना.  	पश्चिमी देशों और ईसाइयों में ईमान की दो नई परिभाषायें सामने आई हैं: 	१. कट्टरपंथी आस्था या बौध्दिकता विरोधी आस्था; इस के अनुसार धर्म अल्लाह पर ईमान और में बुद्धि और तत्वमीमांसा metaphysics में अक्ल और बुद्धि का कोई काम नहीं है. 	२. संतुलित आस्था; इसके अनुसार धार्मिक बुनियादों और उसूलों को साबित करने और मज़बूत बनाने के लिए बुद्धि व तर्कों का सहारा लिया जासकता है.अगरचे इनके अनुसार ईमान का दर्जा बुद्धि से ऊपर ही होता है. 	कुछ इस्लामी रहस्यवादियों और अख्बारियों की बातें भी कट्टरपंथी आस्था या बौध्दिकता विरोधी आस्था के नज़रिये से मिलती जुलती है. और ग़ज़ाली और मौलवी को एक हद तक संतुलित आस्था वाला माना जासकता है. 	ऐसा लगता है कि पेचीदा और बे सर पैर के दार्शनिक तर्कों की वजह से ही नई आस्था और ईमान का नज़रिया सामने आया है. हर जानदार कुछ चीज़ों से लगाओ रखता है. इन्सान भी भौतिक चीज़ों के अलावा ज्ञान सुन्दरता ...जैसी कुछ अध्यात्मिक चीजों से लगाओ रखता है.ईमान भी अध्यात्मिक लगाओ की एक आख्रिरी हालत है और दूसरी सारी अध्यात्मिक चीज़ें इसी के अधीन होती हैं.  	ईमान का दायरा इन्सान के लिए मुकद्दस होता है; यानि इस जगह पर इन्सान का अध्यात्मिकता से यह लगाओ आखिर में पाक व मुक़द्दस मामले में बदल जाता है और उसके बाद ही बहादुरी हिम्मत और प्रेम जैसे तत्व पैदा होते हैं. 	ईमान से जुड़े हुए तत्व निर्धारित हैं इस लिए इन्सान को उनका ज्ञान होना चाहिए. [ 1 ]  	विभिन्न समुदायों की तरफ़ से ईमान शब्द की वभिन्न परिभाषाएं की गई हैं.  	शिया दर्शनशास्त्री और क़ुरआन के टीकाकार मुफ़स्सिर अल्लामा तबताबाई ईमान की परिभाषा इस तरह करते हैं: 	 ईमान सिर्फ़ ज्ञान और जानना ही नहीं है;क्योंकि क़ुरआन की कुछ आयतें ऐसे लोगों के बारे में भी हैं जो ज्ञानी और जानकार होने के बावजूद गुमराह होगये इसलिए मोमिन के लिए ज़रूरी है की ज्ञान व जानकारी के साथ उसकी आवश्यक्ताओ को भी पूरा करे और अपने ज्ञान के अनुसार चले और पाबन्द रहे यहाँ तक कि इल्म व ज्ञान के आसार उससे ज़ाहिर होने लगें. जिसे यह ज्ञान है कि अल्लाह एक है और उसके सिवा कोई अल्लाह और इबादत के लायक़ नहीं है तो उसे चाहिए कि अपने इस ज्ञान का पाबन्द रहे; यानि इबादत के समय ख़ुद को बन्दा माने और अल्लाह कि ही इबादत करे. [ 2 ]  	क़ुरआन में अल्लाह के सारे हुक्म ईमान के इर्दगिर्द ही घूमते हैं. और सैकड़ों आयतों में इस बात की ताकीद की गई है की ईमान के ज़रिये ख़ुद को नजात दो. [ 3 ] इस लिए इस्लामी विद्वानों की निगाह में ईमान की विशेष अहमियत है.  	इस्लामी धर्मशासत्रियों के बीच ईमान के बारे में तीन नज़रिये पाए जाते हैं: 	१. अशाएरह: इमान यानी अल्लाह के होने उसके नबियों को मानना और उसकी आज्ञाओं का पालन करना जिसे उसने अपने नबियों के द्वारा भेजा है और दिली ईमान को ज़बान से भी कहना; यानि उस ज़ाहिर होजाने वाली सच्चाई की गवाही देना और उसका क़बूल करना. इस में एक तरफ़ मन से झुक जाना और तस्लीम होजाना है और दूसरी तरफ़ एक तरह से सक्रिय रूप से गवाही और पुष्टि है. [ 4 ]  	२. मोतज़ेला: ईमान यानि जिम्मेदारियों को अंजाम देना और फ़रीज़े को पूरा करना.  	अल्लाह और उसके नबियों की गवाही और पुष्टि ख़ुद ज़िम्मेदारी को अंजाम देना है. दूसरी ज़िम्मेदारियाँ वाजिब को अंजाम देना और हराम को छोड़ना है.और जो इन्सान सारे फरीजों और वाजिब कामों को अंजाम देता है वो मोमिन होता है.इन लोगों के अनुसार ईमान अमल और कर्म से होता है ना सिर्फ़ नजिरये से. [ 5 ]  	३. अक्सर दार्शनिक धर्मशास्त्रियों का कहना है: 	ईमान यानि: इस जगत की वास्तविकता का दार्शनिक ज्ञान . या दुसरे शब्दों में ; इंसानी नफ़स आत्मा जब कमाल और सैद्धांतिक पूर्णता Theoretical perfection के पड़ाव तय करता है तो ईमान पैदा होता है. तो वाजिब और अनिवार्य चीज़ों को अंजाम देना और हराम और मना की हुई चीजों से परहेज़ करना ज्ञान और इल्म का बाहरी असर है.और यह आत्मा का अमली पूर्णता Practical perfection की तरफ़ सफ़र भी है और मोमिन की श्रद्धा और अक़ीदा जितना जगत की वास्तविकता के अनुसार होता जायेगा उसका ईमान उतना ही पूर्ण और कामिल होता जायेगा. [ 6 ]  	इसीलिए सदरुल मुताअल्लेहीन जब अपनी किताब अस्फ़ारे अरबा  चार यात्रायें के तीसरे सफ़र में तौहीद की बात करना शुरू करते हैं तो लिखते हैं: 	  	 ثم اعلم ان هذه القسم من الحکمه التى حاولنا الشروع فیها هو افضل اجزائها و هو الایمان الحقیقى بالله و ایاته و الیوم الاخر ، المشار الیه فى قوله تعالى: و المؤمنون کل امن بالله و الملائکته و کتبه و رسله ، و قوله: و من یکفر بالله و ملائکته و رسله و الیوم الاخر فقد ضل ضلالا بعیدا . وهو مشتمل على علمین شریفین: احدهما العلم بالمبدا و ثانیها العلم بالمعاد ، و یندرج فى العلم بالمبدا معرفه اله و صفاته و افعاله و اثاره ، و فى العلم بالمعاد معرفه النفس و القیام و علم النبوات . [ 7 ]  	इस नज़रिये में अल्लाह और नबियों की पुष्टि एक तार्किक पुष्टि मन्तिकी तसदीक़ है जिसका संबंध एक बाहरी वास्तिविकता औए हकीक़त से है और वो वास्तविक जगत की जानकारी और ज्ञान का एक हिस्सा है. फ़रीज़े और अनिवार्य बातों पर अमल और ज़िम्मेदारी के माना ईमान के माना से अलग हैं. 	लेकिन रहस्यवादियों की निगाह में ईमान इल्म व ज्ञान से पैदा होता है न कि कर्म व गवाही से. बल्कि ईमान का सार हक़ीक़त अल्लाह की तरफ तवज्जोह करना और उसके अलावा हर चीज़ से मुंह मोड़ लेना है. 	 الایمان هو الذى یجمعک الى اله و یجمعک بالله ، و الحق واحد و المؤمن متوحد و من وافق الاشیا فرقه الاهوا و من تفرق عن الله بهواه و اتبع شهوته و ما یهواه فاته الحق   	 ईमान वह है कि जो तुम्हे ख़ुदा की तरफ़ मोड़ दे और तुम्हारा ध्यान उसकी तरफ़ करदे; यानि अल्लाह पर ईमान लाना उसकी तरफ़ ध्यान करना है और हक़ के अलावा हर चीज़ से मुह मोड़ लेना है. तो अल्लाह के अलावा चीज़ों से जितना लगाओ बढ़ता जायेगा ईमान उतना ही कम होता जायेगा. ईमान अल्लाह की तरफ़ तवज्जोह है और उसके अलावा की तरफ़ तवजोह उसके विपरीत है. और दो विपरीत चीज़ एक साथ नहीं हो सकती है. [ 8 ]  	अक्सर ईसाई धर्मशास्त्रियों ने भी ईमान की परिभाषा में रहस्यवादियों का रास्ता ही अपनाया है. इयान बर्बूर लिखता है: 	 तिलीख कहता है कि दीन व धर्म का सम्बन्ध हमेशा  आख़िरी लगाओ  से होत है जिस की तीन विशेषतायें हैं. १. लगाओ की आख़िरी हद तक पहुंचना यानि बेख़ौफ़ प्रतिबद्धत्ता भक्ति और निष्ठा. इस जगह पर मौत व ज़िन्दगी का मामला है कि अगर इस राह में इन्सान की जान पर भी बात आजाए तो भी पीछे न हटे २. आख़िरी हद तक लगाओ इन्सान में एक खास अहमियत और महत्त्व पैदा करदेता है और दूसरे सारे गुण उसी के अनुसार तय होते हैं. ३. आख़िरी हद तक लगाओ व्यापक होता है और उसमें ज़िन्दगी पाने के रास्ते छुपे होते हैं; क्योंकि उसका संबंध इंसानी की ज़िन्दगी के सारे पहलुओं से होता है. [ 9 ]  	दूसरी जगह पर रिचर्डसन की बात नक़ल करता है: 	 पवित्र किताब में लिखे ईमान शब्द को समझने क लिए ये जान लेना ज़रूरी है कि यह मसला तार्किक ज्ञान द्वारा एक सोच या एक मतलब को स्थापित करने से कम नहीं है. यह समझने की बात है ना की साबित करने की. [ 10 ]  	  	इस नज़रिए में यह बताने के साथ साथ कि ईमान का मसला ज्ञान और जानकारी से बढ़ कर है यह भी बताना चाहता है कि ईमान बुद्धि और अक्ल के विपरीत काम और कोई अन्धविश्वास नहीं है.  	 नया नियम New Testament की बहुत सी इबारतों और आयातों में ईमान को डर और व्याकुलता के मुकाबले में बताया गया है.ईमान यानि: इन्सान के ईरादे का हिदायत पाना और उसकी आस्था में वृद्धि होना है ताकि उसे किसी मामले की सच्चाई और उसके सही होने का विश्वास होसके. एतेमाद या भरोसा एक ऐसी प्रतिक्रिया है जो अल्लाह उसके माफ़ करने और उसके करम को कबूल करने से पैदा होता है और इन्सान का काम भी भरोसा करना ही है. चाहे वो अल्लाह पर भरोसा हो कि इस तरह इन्सान अपनी ताक़त पर भरोसा नहीं करता. अल्लाह की तरफ़ तवज्जोह के बाद इन्सान हर उस चीज़ से मुंह मोड़ लेता है जिस पर वो पहले भरोसा करता था.ईमान के लिए भरोसा निष्ठा और आज्ञा का पालन इताअत आवश्यक है. [ 11 ]  	ईमान के लिए अंग्रेज़ी में Fideism [ 12 ] शब्द इस्तेमाल होता है. जो बुद्धिवाद या तर्कवाद rationalism के विरुद्ध इस्तेमाल होता है. ईमानवादी या आस्थावादी नजरिये के अनुसार धार्मिक वास्तविकताओं को सिर्फ ईमान से ही पाया जासकता है और तर्कों और बुद्धि द्वारा उन वास्तविकताओं तक नहीं पहुंचा जासकता है. इस मसले का इतिहास बहुत पुराना है और संत पोल्स तक पहुँचता है. लेकिन इस मसले को १९ शताब्दी से अब तक गंभीरता के साथ लिया गया है जो विशेष तौर पर पश्चिमी दुनिया और ईसाइयत में बहुत ज़ियादा प्रचलित है. 	आस्थावाद दो तरह के हैं कट्टर और संतुलित: 	  १. कट्टरपंथी आस्था या बौध्दिकता विरोधी आस्था; 	कट्टरपंथ आस्थावादी शोस्तोफ़ कहता है: 	 सारी बौद्धिक कसौटियों का इन्कार सही ईमान का एक हिस्सा है. उसका मानना है कि इन्सान धार्मिक शिक्षाओं के अनुसार बग़ैर किसी बौद्धिक तर्क के इस बात पर ईमान ला सकता है कि २ + २=५ होता है. इस तरह का ईमान और आस्था सही व सच्चे ईमान का नमूना है. [ 13 ]  	 कियार्क्गूर  और दुसरे कट्टरपंथ आस्थावादियों के अनुसार धार्मिक वास्तविकतायें किसी भी तरह के बौद्धिक तर्कों से साबित नहीं की जासकती है उन्हें सिर्फ़ ईमान के ज़रिये ही हासिल किया जासकता है. धार्मिक उसूल न सिर्फ़ अक्ल से परे हैं बल्कि अक्ल के विपरीत हैं. [ 14 ]  	२. संतुलित आस्थावाद; 	इस तरह की अस्थावाद अगुसिनी की ईसाई रवायत से पैदा हुई है. इस में कहा गया है की अगरचे ईमान व आस्था अक्ल व तर्क से उपर है लेकिन कहीं कहीं धार्मिक वास्तविकता को बताने और समझाने में काम आसकते हैं. [ 15 ]  	 इस्लामी विचारधारा में अस्थावाद: 	अगरचे इस्लाम में ईसाइयत और पश्चिमी दुनिया की तरह कट्टरपंथ आस्थावाद नहीं पाया जाता है लेकिन उसके बावजूद कुछ इस्लामी विचारकों की बातें पश्चिमी आस्थावाद से मिलती जुलती हैं. 	जैसे अखबारी सोच हर तरह के तर्क और बौद्धिकता को धर्म व दीन से अलग जानती है. 	 साथ साथ मुह्युद्दीन अरबी  फुतुहाते मक्किया में और उन जैसे कुछ इस्लामी रहस्यवादी आरिफ़ के यहाँ कट्टर आस्थावाद नज़र आता है. उनके अनुसार अगर कोई तर्क व बुद्धि द्वारा ईमान पैदा करता है तो वह असल में ईमान लाया ही नहीं; क्योंकि सच्चा ईमान वह है जो वही व श्रुति पर आधारित होता है और यह ईमान बुद्धि और तर्क पर आधारित है. [ 16 ]  	 ईमाम मोहम्मद ग़ज़ाली को संतुलित आस्थावादी कहा जासकता है. उनका कहना है कि अध्यापक या उस्ताद की बातों से ईमान में वृद्धि नहीं होसकती है. उनके अनुसार ईमान ऐसा नहीं कि अक्ल व तर्क से उसकी कोई जंग हो. ईमान अल्लाह का एक रौशन नूर है जो वह अपने करम और रहम से अपने बन्दों को देता है. 	 मौलवी भी सिर्फ़ तर्क और बुद्धिकता के सहारे ईमान हासिल करने को बैसाखी पर चलने जैसा मानते हैं और बुद्धि व अक्ल को इश्क़ व ईमान में डूबा हुआ मानते हैं. उनके अनुसार तर्क द्वारा हासिल किया हुआ ईमान कभी भी ढह सकता है. [ 17 ]  	नोट: 	ऐसा लगता है कि इस्लाम या ईसाइयत दोनों ही में पेचीदा और बे सर पैर के दार्शनिक तर्कों और ईमान की हकीक़त को दार्शनिक मामलों में उलझा देने की वजह से ही नई आस्था और ईमान का नज़रिया सामने आया है.   और इसी तरह ईसाइयत में इस मामले में आध्यात्मिक दावों के कमज़ोर प्रमाणों की वजह इस मसले को और मज़बूती मिल गई. दर अस्ल बहुत से ईसाई आस्थावादी विचारक यह चाहते हैं कि धर्म के रत्न और उसकी हकीक़त को पेचीदा और बेजान बौद्धिक तार्किक व धर्मशास्त्र की बहसों से आज़ाद करदें. [ 18 ]    	 		   	 	 		 [ 1 ] . पॉल तिलीख पूयाईये ईमान तर्जुमा हुसैन नौरोजी प १६ १७ इन्तेशाराते हिकमत. तेहरान १३७५ हिजरी शम्सी.  	 		 [ 2 ] .ताबताबई सय्यद मोहम्मद हुसैन तर्जुमा तफसीर अलमीज़ान ज१८ प४११ ४१२ बुनियादे इल्मी व फर्हंगिये अल्लामा ताबबाई १३६३ हिजरी शम्सी   	 		 [ 3 ] . जैसे सुरे असर .  	 		 [ 4 ] . देखो: मक़ालातुल इस्लामियीन अबुलहसन अशअरी ज१ प३४७ मिस्र १९६९ ई ; अल्लमअ प७५ प्रकाशित मदीना १९७५ ई; तफ्ताज़नी शरहुल मक़ासिद ज२ प१८४ प्रकाशित उस्मानी १३०५ हिजरी मोहम्मद मुजतहिद शबिस्तरी ईमान व आज़ादी तरहे नौ तेहरान तीसरा संस्करण १३७९ हिजरी शम्सी.   	 		 [ 5 ] . मोतज़ेला के अक़ाएद के बारे में अहमद अमीन फ़ज्रुल इस्लाम व ज़ुहल इसलाम मोतेज़ला की बहस देखें.  	 		 [ 6 ] . शहीदे सानी हकाय्कुल इस्लाम  प१६ १७ १८.  	 		 [ 7 ] . सदरुद्दीन  मोहम्मद शीराज़ी अल्हिक्मातुल मुताआलियःफिल अस्फारिल अर्बअह ज६ प७ दारुल एहयाइत्तोरासिल अरबी बेरूत लेबनान चौथा संस्करण १९९०ई.   	 		 [ 8 ] . खुलासे शरहुत्तारीफ़ पांचवीं सदी हिजरी की इरफानी किताब प२२७ इन्तेशारत बुनियादे फरहंगे ईरान.  	 		 [ 9 ] . इयान बरबूर इल्म व दीन तर्जुमा फ़ारसी बहाउद्दीन खुर्रमशाही प२५७ मर्कज़े नश्रे दानिश्गाहे तेहरान १३६२ हिजरी शम्सी.  	 		 [ 10 ] . पिछला प २५९.  	 		 [ 11 ] . Alam Riehardson cd. A Theological Work book of the bible  london SCM press 1951 pb पिछला प २६०.  	 		 [ 12 ] . आस्थावाद की बहस  किताब फरहंगे वाजेहा से लिया गया लेखक अब्दुर्रसूल बयात और दुसरे लोग.  	 		 [ 13 ] . पिछला  	 		 [ 14 ] . पिछला  	 		 [ 15 ] . पिछला  	 		 [ 16 ] . पिछला  	 		 [ 17 ] . पिछला  	 		 [ 18 ] . पिछला]]></description>

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			<title>इन्सान की सफ़लता और उसका कमाल किस चीज़ में है .</title>
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			<description><![CDATA[इस सवाल के व्यापक और तफ़सीली जवाब के लिए पहले दो बुनयादी सवालों का जवाब देना ज़रूरी है . 	१. सआदत के मानी क्या हैं और क्या सआदत कमाल से अलग है? 	२. इन्सान किस तरह का प्राणी है...?    ऐसा मालूम पड़ता है कि कमाल सआदत से अलग नहीं है. इन्सान जितना कमाल हासिल करता जाएगा उतना ही सआदत तक पहुँचता जायेगा. इन्सान एक ऐसा प्राणी है जो रूह यानि आत्मा और जिस्म से मिलकर बना है और मनुष्य का अस्तित्व रूह से ही है. आत्मा और जिस्म को सआदत की प्राप्ति उसी समय होती है जब वे दोनों अपने वुजूद के कमाल और उसकी उत्तमता तक पहुंच जाते हैं. रूह की सफ़लता और सआदत अल्लाह से नजदीक होने और उस तक पहुँचने में है. यानि इस सूरत में मनुष्य अपनी उत्तमता और पूर्णता के अंत तक पहुँच जाता है. अगरचे इस्लामी रवायतों में जिस्म की सलामती और माद्दी भौतिक मामलों को भी इंसानियत की सफ़लता में हिसाब किया जाता है.    इस के बावजूद कुछ लोग सआदत को कमाल से अलग जानते हैं या नृविज्ञान में विभिन्न राय रखते हैं दूसरी जगहों पर उनकी आलोचना और समीक्षा की गई है. जैसा कि कुछ लोग मनुष्य को एक भौतिक और माद्दी प्राणी मानते हैं और कहते हैं कि उसकी सआदत भौतिक और माद्दी सुखों में है. दर्शनशास्त्र के कुछ लोग बुद्धि को को इन्सान का अस्तित्व मानते हैं .कुछ रहस्यवादी इरफ़ान वाले लोग इश्क़ को मानवता और इंसानियत की कसौटी और मानक जानते हैं और...  क्यों हकीक़त को नहीं जानते हैं इस लिए अफसाना बना लिया. शेर. इस सवाल का सही और विस्तृत जवाब उसी सूरत में मिल सकता है जब सआदत के माने को सही तौर पर बयान किया जाए और इन्सान और उसकी पैदाइश के उद्देश्य को पहचाना जाए. कांट जैसे कुछ लोग सआदत को कमाल से अलग मानते हैं. कांट इस बारे में कहता है इस पूरी दुनिया में सिर्फ एक ही कमाल और अच्छाई है और वह नेक इरादा और नियत है. और नेक इरादे का मतलब भी रूह और अन्तरात्मा की आज्ञा को मानना है. चाहे ख़ुशी मिले या न मिले. लेकिन सआदत ऐसा सुख और ख़ुशी है जिसमें कोई दर्द और रंज नहीं होता है .और नैतिकता का संबंध उत्तमता से है न कि सआदत से. [ 1 ] लेकिन इस्लामी विध्वान दर्शन व नैतिक शास्त्री कहते हैं : इन्सान जितनी उत्तमता और कमाल प्राप्त करता जाता है उतना ही सआदत तक पहुँचता जाता है. [ 2 ] यह लोग कांट की तरह सआदत को कमाल से अलग नहीं जानते हैं. अगरचे यह ज़रुर कहते हैं कि अगर सआदत का मतलब भौतिक और माद्दी सुख हो तो कमाल इस तरह की सआदत से अलग होगा. [ 3 ] दूसरी तरफ़ से इन्सान के बारे में विभिन्न दर्शनों के विभिन्न दृष्टीकोण की वजह से सआदत के अलग अलग माना सामने आते हैं.   ऐसे दर्शन जो इन्सान को सिर्फ भौतिक और माद्दी प्राणी मानते हैं उनकी द्रष्टिकोण से सआदत भी भौतिक है. और इन में से कुछ अधिक से अधिक माद्दी और भौतिक सुखों की प्राप्ति को इन्सान की पूर्णता और उत्तमता मानते हैं. वह दर्शन जो बुद्धि और अक्ल को इंसानियत की कसौटी मानते हैं उनकी निगाह में दिव्य ज्ञान और शिक्षा द्वारा बुद्धि की तरक्क़ी को सआदत माना गया हैं. व रहस्यवादी और आरिफ लोग कहते हैं कि इन्सान जितना इश्क़ प्राप्त करता जाए उसे सआदत की उतनी ही ज़्यादा प्राप्ति होगी. नीचे जैसे लोग बल और ताक़त को सआदत बुनियाद मानते और बलवान और ताक़तवर इन्सान को सआदत वाला मानते हैं. लेकिन इस्लामी दृष्टिकोण से बुद्धि और इश्क़ के साथ  इन्सान की परिभाषा इस तरह की गई है:   इनसान एक ऐसा प्राणी है जिस में विभिन्न प्रकार की प्रतिभाएँ पाई जाती हैं.वह आत्मा और जिस्म से मिलकर बना है सिर्फ भौतिक और माद्दी प्राणी नहीं है. [ 4 ] उसका वास्तविक जीवन इस दुनिया में नहीं बल्कि दुसरे जहान में है वह अनंत काल के लिए पैदा किया गया है. उसकी सोच कर्म नैतिकता उसका हमेशा बाकी रहना वाला बदन तय्यार करते हैं आदि. इस सोच के साथ इन्सान की प्रतिभायें उसकी सआदत के साथ निखरती हैं और उस को अपनी रूह और जिस्म की ज़रूतों का मुनसिब जवाब मिलजाता है.   अल्लामा तबातबाई इस बारे में कहते हैं: हर चीज़ की सआदत उसका उसके अस्तित्व की उत्तमता तक पहुंचना है और इन्सान जो रूह और जिस्म से मिलकर बना है उसकी सआदत रूहानी और जिस्मानी सारी अच्छाइयों तक पहुंचना है. और उससे फायदा उठाना है . [ 5 ]    रूह और आत्मा जो अल्लाह की तरफ से है [ 6 ] و نفخت فیه من روحى तो उसकी सआदत भी अल्लाह से नज़दीक और पहुंचने में ही होगी. यानि उसी जगह वापस जाना जहाँ से आया था. या यूँ कहा जाए की इन्सान की रूह का अस्तित्व अल्लाह या परमात्मा से है  انالله और वह इस प्राकृतिक दुनिया में रहते हुए वुजूद के स्तर को बढ़ाता है और उसकी सआदत इस बात में है कि वह इश्क़ और वैकल्पिक मौत [ 7 ] के साथ इस प्राक्रतिक दुनिया से कूच कर जाए. और उसी जगह पहुँच जाए जो उसके लिए है जिसे  و انا الیه راجعون कहते हैं. ऐसे इन्सान का बदन अगरचे इस दुनिया में होता है लेकिन उसकी आत्मा किसी और जगह से जुड़ी हुई होती है. [ 8 ] लेकिन इसका मतलब भौतिक मामलों की तरफ़ से ग़फ़लत नहीं है. क्यों कि भौतिक और माद्दी चीजों व नेमतों से लाभ उठाना भी इन्सान की सआदत में गिना जाता है. और यह ताकीद की गई है कि इन्सान को चाहिए कि स्वास्थ्य के सिद्धांतों की रियायत करते हुए अपने शरीर को मजबूत करे.क्यों की सही व सालिम जिस्म सही व सालिम रूह की शर्त है. [ 9 ] बल्कि इसका मतलब यह है कि आत्मा और रूह के द्वारा मनुष्य की पहचान होती है और उसकी पैदाइश का उद्देश मालूम होता है और वह उद्देश परमात्मा या अल्लाह के समीप पहुंचना है.    یا ایتها النفس المطمئنه * ارجعى الى ربک راضیه مرضیه * فادخلى فى عبادى * و ادخلى جنتى [ 10 ]     ऐ; मुतमईन नफस आत्मा अपने रब की तरफ़ लौट आ इस तरह कि तू उससे राज़ी है वह तुझसे राज़ी है। अतः मेरे बन्दों में सम्मिलित हो जा और मेरी जन्नत में प्रवेश कर-     یا ایها الانسان انک کادح الى ربک کدحا فملاقیه [ 11 ]    ऐ मनुष्य ! तू मशक़्क़त करता हुआ अपने रब ही की ओर खिंचा चला जा रहा है और अन्ततः उससे मिलने वाला है    فى مقعد صدق عند ملیک مقتدر [ 12 ]    प्रतिष्ठित स्थान पर प्रभुत्वशाली सम्राट के निकट        و ما خلقت الجن و الانس الا لیعبدون [ 13 ]    मैंने तो जिन्नों और मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी बन्दगी करे   इबादत परमात्मा या अल्लाह से करीब होने का साधन है.    و استعینوا بالصبر و الصلاه... ، [ 14 ]    धैर्य और नमाज़ से मदद लो    इसी लिए कहा जाता है कि हर वह चीज़ जो इन्सान को अल्लाह से करीब करने में मदद करे वह उसकी सआदत को बढाती है. इससे पता चलता है कि सिर्फ नमाज़ ही अल्लाह से करीब करने का साधन नही है बल्कि अल्लाह के बन्दों की सेवा भी इबादत है और अल्लाह से करीब करने का साधन है.   	अल्लामा तबताबाई कहते हैं : [ 15 ] यह नेमतें उसी सूरत में नेमत हिसाब होंगी जब वो इन्सान सृष्टि और पैदाइश के उद्देश के अनुरूप हो; क्यों कि इन को इस लिए बनाया गया है ताकि असली सआदत की राह को तय करने में यह अल्लाह की तरफ़ से मदद बन सकें. और वह सआदत अल्लाह की बन्दगी और उसके ससमक्ष समर्पित होकर उससे नज़दीक होजाना है. कि वो कहता है : و ما خلقت الجن و الانس... .        	 		   	 	 		 [ 1 ] . मुर्तजा मुतःरी  फलसफ ए अखलाक़  प ७० ७१   	 		 [ 2 ] . अखलाक़ कि किताबों में सआदत को अखलाक़ का रुक्न बताया गया है किताब मेराजुसादाह  प १८ व २३ देखें .  	 		 [ 3 ] . मुर्तजा मुतःरी  फलसफ ए अखलाक़  प ७२  	 		 [ 4 ] . हीज्र:२९ व मोमेनून : १२ से १४  	 		 [ 5 ] .मोहम्मद हुसैन तबातबाई तफसीर अलमीज़ान ज ११ प २८   	 		 [ 6 ] . हीज्र २९ . तो जब मैं उसे पूरा बना चुकूँ और उसमें अपनी रूह फूँक दूँ.  	 		 [ 7 ] . वैकल्पिक मौत यानी नफ़स से जिहाद और उस पर काबू पाना है. जैसा कि हज़रत अली अ.स ने फ़रमाया : 		  		 قد احیى عقله و امات نفسه नह्जुल्बलागा खुतबा २२०   	 		 [ 8 ] . नह्जुल्बलागा ख़त१४७  من کلام له ع لکمیل بن زیاد النخعی: ...صحبوا الدنیا بابدان ارواحها معلقه بالمحل الاعلى   	 		 [ 9 ] .उसूले काफी ज२ प५५०.  	 		 [ 10 ] .फ़ज्र :२७  	 		 [ 11 ] .इन्शेकाक ६   	 		 [ 12 ] . क़मर ५५  	 		 [ 13 ] .ज़ारियात ५६  	 		 [ 14 ] .बक़रह ४५  	 		 [ 15 ] . मोहम्मद हुसैन तबातबाई तफसीर अलमीज़ान ज५ स २८१]]></description>

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